शिक्षाविदों की राय है कि बच्चों में अखबार पढ़ने से बच्चों में न केवल ताजा घटनाओं और वैश्विक जानकारियों से अवगत होंगे, बल्कि उनमें विज्ञान, आर्थिक व सामाजिक सरोकारों का ज्ञान भी बढ़ेगा। वह राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय के वर्तमान परिदृश्य से भी वाकिफ होंगे और उनका शब्द भंडार भी मजबूत होगा। सबसे बड़ी बात कि इंटरनेट के युग में उनकी पढ़ने की आदत विकसित होगी। ये राय प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों में बच्चों को समाचार पत्र पढ़ने के आदेश को लेकर शिक्षाविदों ने अमृत विचार से विशेष बातचीत में कही। उच्चशिक्षा से जुड़े शिक्षाविदों ने सरकार के इस फैसले का मुक्त कंठ से स्वागत किया है। बच्चे मोबाइल पर समय बिताना पसंद करते हैं, रोजाना अखबार पढ़ने से उनके अंदर पढ़ने की आदत के साथ सामान्यज्ञान और महत्वपूर्ण सोच विकसित होगी। फोमो (फियर ऑफ़ मिसिंग आउट) अर्थात “कुछ छूट जाने के डर” से और फेक न्यूज़ के दुषप्रभावों से भी छुटकारा मिलेगा।
समाचार पत्र हमें विज्ञान, समाज और संस्कृति से जोड़ते हुए न केवल नवीनतम जानकारी प्रदान करते हैं, बल्कि निरंतर नए विचारों के लिए प्रेरित भी करते हैं। मशीन लर्निंग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के तेज़ी से बदलते परिदृश्य में, छात्रों के सामने शिक्षा के व्यावहारिक अनुप्रयोगों को प्रस्तुत करना आवश्यक है।
-प्रो. आर पी सिंह, निदेशक अंतरराष्ट्रीय प्रकोष्ठ, लखनऊ विश्वविद्यालय अभिभावकों का बच्चों से समाचार पत्र के माध्यम से भी संवाद बढ़ेगा। इस विषय में वे ट्यूटर पर निर्भर नहीं रहेंगे। परिवार और समाज के अन्य बड़ों जिनके वे संपर्क में आते हैं उनसे संवाद बढ़ेगा, और उनसे विविध विषयों पर बातें करके उनकी समझ विकसित होगी। अनजाने ही वैचारिक रूप से परिपक्व होते रहेंगे।
-डॉ. सुप्रिया सिंह, असिस्टेंट प्रोफेसर, समाजशास्त्र विभाग, खुनखुन जी गर्ल्स डिग्री कॉलेज
समाचार पत्र पढ़ने से बच्चों की पठन क्षमता, शब्दावली और सामाजिक, राजनीतिक व वैज्ञानिक विषयों की सामान्य समझ में निश्चय ही वृद्धि होगी। यह कम उम्र से ही जिज्ञासा, आलोचनात्मक सोच और जागरूक नागरिकता को बढ़ावा देने वाला कदम है। हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों समाचार पत्रों का अध्ययन द्विभाषी दक्षता को भी सशक्त करता है।
-डॉ. अलका सिंह, शिक्षक, डॉ. राम मनोहर लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविधालय
समाचार पत्र पढ़ना अनिवार्य करना सकारात्मक कदम है। छात्र कम उम्र से ही समाज, विज्ञान, पर्यावरण और राष्ट्रीय मुद्दों की जानकारी प्राप्त कर सकेंगे। पाठ्यपुस्तकों से आगे बढ़कर आलोचनात्मक सोच और जागरूकता को भी प्रोत्साहित करते हैं। यदि इसे सही तरीके से लागू किया जाए, तो यह पहल जागरूक, विचारशील और जिम्मेदार नागरिकों के निर्माण में सहायक हो सकती है।
-प्रो. रजिया परवीन, नारी शिक्षा निकेतन पीजी कॉलेज
समाचार पत्र में सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, अंतरराष्ट्रीय,धार्मिक, पर्यावरण, खेल कूद एवं अन्य गतिविधियों की जानकारी के साथ साथ सम-सामायिक की सूचनाएं प्रकाशित होती है। मोबाइल फ़ोन व कंप्यूटर के दौर में विद्यार्थी अधिकतम समय बिताते हैं, जिससे वे समाचार पत्रों से दूर होते जा रहा हैं। इसका दुष्प्रभाव यह है कि वे न तो शुद्ध हिंदी और न ही शुद्ध अंग्रेज़ी लिख पाते हैं, न ही बोल पाते हैं।
-प्रो. बंशीधर सिंह, विधि विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय
मनोवैज्ञानिकों द्वारा सिद्ध प्रयोग में भी यह पाया गया है की बचपन का ज्ञान सदैव साथ रहता है। एक ओर एक दिनचर्या निश्चित करने व अख़बार पढ़ने से बच्चों में लगातार पढ़ने की आदतों, भाषा शैली में सुधार तथा आसपास की ख़बरों के प्रति जागरूकता बढ़ेगी जो कि बच्चों के व्यक्तित्व विकास में सहायक सिद्ध होंगी।
-प्रो. राकेश द्विवेदी, विभागाध्यक्ष, समाज कार्य विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय
डिजिटल युग में यह बच्चों को सूचना के विश्वसनीय स्रोतों से जोड़ने का एक सशक्त माध्यम बनेगा। बच्चों में रटने की आदत के बजाय दुनिया की घटनाओं को समझने और विश्लेषण करने की क्षमता विकसित होगी। उनकी शब्दावली और वर्तनी में सुधार होगा। यह पहल ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों के बच्चों के बीच ”ज्ञान की खाई” को पाटने में मील का पत्थर साबित होगी।
-प्रो. मुकुल श्रीवास्तव, निदेशक, आईपीपीआर, लखनऊ विश्वविद्यालय
समसामयिक विषयों के अध्ययन से सामान्य ज्ञान भी बढ़ेगा, बैठकर पढ़ने की आदत पड़ेगी उससे एकाग्रता भी बढ़ेगी क्योंकि आजकल के बच्चों में इसकी कमी देखी जा रही। शिक्षकों द्वारा पूरे हफ्ते के समसामयिक विषयों पर प्रश्नोत्तरी भी करवानी चाहिए तब इस अभियान की सार्थकता सिद्ध हो पाएगी।
-प्रो. मंजुला उपाध्याय, प्राचार्य, नवयुग कन्या महाविद्यालय
समाचार पत्र पढ़ने से न केवल उन्हें प्रामाणिक जानकारी प्राप्त करने, अपने ज्ञान को समृद्ध करने और प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता पाने में सहायता मिलेगी, बल्कि यह उनके बढ़ते स्क्रीन टाइम पर भी अंकुश लगाएगा। कोविड के बाद से बच्चे पढ़ने के लाभों से लगभग पूरी तरह दूर हो गए हैं।
-प्रो. रचना श्रीवास्तव
एक शिक्षाविद् और बाल अधिकार कार्यकर्ता के रूप में मैं इस पहल को सद्भावना से लिया गया, किंतु संतुलन की आवश्यकता वाला कदम मानती हूं। अख़बार पढ़ने की आदत भाषा कौशल, सामान्य ज्ञान, आलोचनात्मक सोच और पठन संस्कृति को मज़बूत कर सकती है। जो आज के डिजिटल युग में अत्यंत आवश्यक है।
-ऋचा खन्ना, पूर्व सदस्य मैजिस्ट्रेट, बाल कल्याण समिति (किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण)
GDS Times | Hindi News Latest News & information Portal