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जब पुत्र Ganesh ने मां Parvati को दिया था दिव्य वरदान, जानें क्या है यह अनोखी पौराणिक कथा

भगवान गणेश को प्रथम पूज्य देवता और विघ्नहर्ता भी कहा जाता है। वह मां पार्वती के प्रिय और आज्ञाकारी पुत्र हैं। मां पार्वती ने अपने शरीर के मैल और दिव्य शक्ति से गणेश का जन्म किया था। मां-पुत्र का यह संबंध बेहद पवित्र और अनोखा है। इसमें भक्ति और ममता का गहरा भाव छिपा है। भगवान गणेश ने अपनी मां देवी पार्वती की आज्ञा का पालन करने के लिए अपना मस्तक तक कटवा दिया था। जिसके बाद उनको हाथी का सिर लगाकर पुनर्जीवित किया गया था। साथ ही भगवान गणेश को सभी देवताओं में प्रथम पूज्य होने का आशीर्वाद भी मिला था।

ऐसा भी माना जाता है कि मां पार्वती ने भगवान गणेश को एक मां के रूप पर सभी तरह की शिक्षा प्रदान की थी। वहीं पुत्र के तौर पर श्रीगणेश ने भी उन सभी शिक्षाओं को ग्रहण किया था। लेकिन एक घटना ऐसी है, जब भगवान गणेश ने अपनी मां देवी पार्वती को एक वरदान दिया था।

क्या दिया था वरदान

पौराणिक कथाओं के मुताबिक भगवान गणेश ने अपनी मां देवी पार्वती को एक महत्वपूर्ण और विशेष वरदान दिया था। बता दें कि यह वरदान विशेष रूप से संकष्टी चतुर्थी के व्रत से संबंधित है। जिसको माताएं अपनी संतान की सुख-समृद्धि और लंबी आयु के लिए रखती हैं।

मां पार्वती ने अपने पुत्र गणेश के लिए एक खास व्रत और पूजा की थी। जिसको आज संकष्टी चतुर्थी के रूप में जाना जाता है। तब श्री गणेश ने अपनी मां पार्वती की भक्ति और प्रेम से अति प्रसन्न हुए थे। ऐसे में भगवान गणेश ने मां पार्वती से प्रसन्न होकर उनको एक दिव्य वरदान दिया था।

भगवान गणेश ने वरदान दिया था कि जो भी नारी इस संकष्टी चतुर्थी का व्रत पूरी भक्ति और श्रद्धा के साथ करेगी, उनको भगवान गणेश के जैसे स्नेही, आज्ञाकारी, स्नेही, यशस्वी और दीर्घायु संतान की प्राप्ति होगी। वहीं माताओं पर मां पार्वती की असीम कृपा बनी रहेगी।

भगवान गणेश ने इस वरदान के जरिए अपनी मां के मातृत्व सुख को संसार की सभी माताओं तक पहुंचाने का आशीर्वाद दिया था। यह वरदान सिर्फ संतान प्राप्ति के लिए नहीं था बल्कि संतान के जीवन में आने वाले सभी संकटों को हरने वाला भी था। क्योंकि भगवान गणेश स्वयं ‘विघ्नहर्ता’ हैं।

इसलिए आज भी माताएं संकष्टी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश का व्रत करती हैं। जिससे कि उनके संतान को भी भगवान गणेश जी के जैसा सुख-सौभाग्य मिले और सभी तरह के विघ्नों से मुक्ति मिल सके। माता पार्वती को यह वरदान पुत्र-प्रेम की पराकाष्ठा के रूप में मिला था।

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