उत्तर प्रदेश में बाढ़ नियंत्रण की रणनीति अब बदल रही है। योगी सरकार पारंपरिक तटबंध और पत्थर आधारित सुरक्षा मॉडल से आगे बढ़ते हुए नदियों और बड़े नालों की जलधारण क्षमता बढ़ाने पर जोर दे रही है। सरकार का दावा है कि इस नई व्यवस्था से करोड़ों रुपये की बचत होगी और किसानों की कृषि भूमि के अधिग्रहण की जरूरत भी कम पड़ेगी। अब तक बाढ़ नियंत्रण के लिए बड़े तटबंध, गैबियन दीवारें, पत्थर के स्पर और मिट्टी के बांध बनाए जाते रहे हैं। इन परियोजनाओं में भारी लागत आती थी और कई बार हर वर्ष मरम्मत पर भी करोड़ों रुपये खर्च होते थे। नई रणनीति के तहत सरकार संवेदनशील क्षेत्रों में नदियों से गाद निकालने, नदी के मार्ग को चौड़ा और गहरा करने तथा पानी के बहाव को सुचारु बनाने पर काम कर रही है। सरकार के अनुसार इस मॉडल से अब तक लगभग 40.72 लाख हेक्टेयर भूमि को सुरक्षित किया गया है, जिससे तीन करोड़ से अधिक आबादी को लाभ मिला। लखीमपुर खीरी की बाढ़ सुरक्षा परियोजना इसका बड़ा उदाहरण मानी जा रही है। यहां नदी की क्षमता बढ़ाने के लिए गाद निकासी पर करीब 22 करोड़ रुपये खर्च हुए, जबकि पहले पारंपरिक मॉडल के तहत 180 करोड़ रुपये की परियोजना प्रस्तावित थी। इसी तरह बाराबंकी के एल्गिन ब्रिज और सरयू क्षेत्र में नए मॉडल पर सिर्फ पांच करोड़ रुपये खर्च हुए, जबकि पहले 115 करोड़ रुपये का अनुमान था। बाढ़ नियंत्रण विभाग ने घाघरा, शारदा और सुहेली जैसी नदियों के कई हिस्सों में 9 से 16 किलोमीटर तक गाद निकासी का कार्य कराया है। इससे मानसून के दौरान नदियों की जल वहन क्षमता बढ़ी है और बाढ़ के खतरे को कम करने में मदद मिली है। सरकार का कहना है कि इस मॉडल से हर वर्ष तटबंध निर्माण और मरम्मत के लिए कृषि भूमि के अधिग्रहण की आवश्यकता भी घटेगी। इससे किसानों को सीधा लाभ मिलेगा। पिछले आठ वर्षों में प्रदेश में 1,665 से अधिक बाढ़ नियंत्रण परियोजनाएं पूरी की गई हैं और 60 नदियों से गाद निकासी कराई गई है। अब वर्ष 2026 से सरकार बाढ़ नियंत्रण के लिए ड्रोन और सेंसर आधारित निगरानी प्रणाली भी लागू करने जा रही है। उच्च जोखिम वाली नदियों और नालों की रियल टाइम मॉनिटरिंग होगी, ताकि मानसून से पहले जरूरी कार्रवाई की जा सके। सरकार का मानना है कि नई तकनीक और कम लागत वाले मॉडल से बाढ़ प्रबंधन अधिक प्रभावी और टिकाऊ बनाया जा सकेगा।
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