2026 के पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में केवल सत्ता परिवर्तन या सत्ता वापसी की घटना मात्र नहीं हैं, बल्कि ये देश की राजनीतिक दिशा और मतदाता के बदलते मनोविज्ञान का एक ऐसा विस्तृत दस्तावेज हैं, जिसने भविष्य की राजनीति के लिए नए प्रतिमान स्थापित कर दिए हैं। इन परिणामों ने स्पष्ट कर दिया है कि भारतीय मतदाता अब केवल भावनात्मक नारों या पारंपरिक वोट बैंक के गणित में उलझने वाला नहीं है, बल्कि वह शासन की जवाबदेही, नेतृत्व की विश्वसनीयता और विकास के ठोस धरातल पर अपना निर्णय सुना रहा है। पूर्वोत्तर की पहाड़ियों से लेकर दक्षिण के तटीय मैदानों तक फैली इस राजनीतिक हलचल का यदि सूक्ष्म विश्लेषण किया जाए तो यह साफ दिखाई देता है कि ‘भगवा’ राजनीति का पूर्वी विस्तार अब अपने चरम पर है, जबकि दक्षिण में क्षेत्रीय अस्मिता और नए राजनीतिक विजन के बीच एक दिलचस्प संघर्ष छिड़ गया है। ये चुनाव परिणाम उन तमाम राजनीतिक पंडितों के लिए एक सबक हैं, जो केवल पुराने आंकड़ों के आधार पर भविष्यवाणियां करते थे, क्योंकि इस बार मतदाताओं ने एक ऐसी ‘परिवर्तन की आंधी’ का सूत्रपात किया है, जिसने कई दिग्गजों के राजनीतिक भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। पश्चिम बंगाल की राजनीति में आए ‘महाभूकंप’ को देखे बिना 2026 के इस जनादेश की व्याख्या अधूरी है। लगभग डेढ़ दशक से राज्य की सत्ता पर काबिज तृणमूल कांग्रेस का ढहना और भाजपा का 150 सीटों के पार जाना यह दर्शाता है कि बंगाल की जनता ‘सिंडिकेट राज’ और ‘कट मनी’ की संस्कृति से ऊब चुकी थी। बंगाल का यह परिणाम केवल एक चुनावी जीत नहीं, बल्कि एक वैचारिक क्रांति है, जहां मतदाताओं ने ‘बंगाली अस्मिता’ के साथ ‘राष्ट्रीय विकास’ के समन्वय को स्वीकार किया है। संदेशखाली जैसी घटनाओं ने शासन के प्रति जो आक्रोश पैदा किया था, वह ईवीएम के माध्यम से ज्वालामुखी की तरह फटा। भाजपा ने यहां जिस प्रकार से हिंदू मतों का ध्रुवीकरण किया और साथ ही मतुआ एवं राजवंशी समुदायों को अपने पक्ष में संगठित किया, उसने टीएमसी के अभेद्य दुर्ग की ईंट से ईंट बजा दी। ग्रामीण बंगाल में ‘प्रधानमंत्री आवास योजना’ और ‘जल जीवन मिशन’ जैसी केंद्रीय योजनाओं ने एक नया ‘लाभार्थी वर्ग’ तैयार किया, जिसने प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण की पारदर्शिता को राज्य सरकार की भ्रष्टाचार युक्त मशीनरी से बेहतर पाया। यह चुनाव परिणाम ममता बनर्जी के उस करिश्मे के अंत का भी संकेत है, जो कभी अपराजेय माना जाता था और अब बंगाल की राजनीति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां सुशासन और कानून-व्यवस्था ही सत्ता की एकमात्र कसौटी रह गई है। असम की ओर रुख करें तो यहां की स्थिति बंगाल से बिल्कुल भिन्न, लेकिन उतनी ही प्रभावशाली है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में भाजपा की ‘हैट्रिक’ ने यह सिद्ध कर दिया है कि जब विकास को सांस्कृतिक अस्मिता के साथ जोड़ दिया जाता है, तो वह एक अजेय फॉर्मूला बन जाता है।
GDS Times | Hindi News Latest News & information Portal