सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा की राते इन दिनों होली के गीतों से गूंज रही हैं। राग से रंग तक पहुंचने के लिए इस शहर की होली को करीब तीन महीने लगते हैं। यही वक्त कुमाउनी होली को देशभर की होलियों से अलग रंग में पिरोता है। डेढ़ सौ साल पहले बैठकी और खड़ी होली के रूप में शुरू हुए इस राग-फाग ने कई पीढ़िया देखीं लेकिन इसका महत्व बढ़ता ही गया। दरअसल, कुमाऊं में होली गायन की परंपरा 165 वर्ष पूर्व अल्मोड़ा से शुरू हुई थी। अल्मोड़ा में पौष मास से फागुन तक तीन माह में पांच अलग-अलग चरणों में बैठकी और खड़ी होली का गायन होता है। पहला चरण आध्यात्मिक होली का है, जो पौष मास के प्रथम रविवार से बसंत पंचमी तक चलने वाली इस होली में निर्वाण पद गाए जाते हैं। दूसरा चरण बसंत पंचमी से महाशिवरात्रि के एक दिन पूर्व तक का है। इसमें प्रकृति आधारित गीत गाए जाते हैं। इसे श्रृंगारिक होली कहते हैं। तीसरा चरण महाशिवरात्रि से होलिका दहन तक चलता है। इसमें रंग भरे राग में हंसी-ठिठोली के गीत गाए जाते हैं। इसके साथ ही खड़ी होली के रंग भी बरसने लगते हैं। आखिरी राग है विदाई राजग, ये राग छलड़ी में होली का समापन पर गाया जाता है। वहीं, यहां तीन विधाओं में होली गायन होती है। जिसमें पहली बैठकी दूसरी खड़ी और तीसरी महिलाओं की होली है। इनमें सभी रागों की होली शामिल होती है। बैठकी होली में शास्त्रीय संगीत पर आधारित रागों का गायन होता है। तीसरी होली महिलाओं पर आधारित है। इस दौरान महिलाएं हंसी-मजाक के रंगों के साथ नृत्य में सराबोर रहती हैं।
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