लोकतंत्र को स्वस्थ बनाए रखने के लिए तीन स्तंभ अर्थात विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका महती भूमिका निभाते हैं। ‘सिस्टम’ के बेहतर संचालन के लिए तीनों स्तंभों को जनतंत्र का ‘मेरुदंड’ कहा जाए तो अतिशयोक्ति न होगा। बीते करीब चार दशक का विश्लेषण करें, तो कानून बनाने वाली विधायिका की गरिमा जहां घटी है, वहीं नीतियों का क्रियान्वयन करने वाली कार्यपालिका की साख भी बुरी तरह प्रभावित हुई है। कहने में कोई गुरेज नहीं कि देश की विधायिका व कार्यपालिका अपने कृत्यों की बदौलत आमजन को खटकने लगी हैं। हमारा महत्वपूर्ण स्तंभ न्यायपालिका भी है, जिसकी कार्यशैली व निर्णयन क्षमता को कठघरे में खड़ा करना आसान नहीं। बिना किसी दबाव, पारदर्शी व्यवस्था व साक्ष्य आधारित देय निर्णय उसकी विश्वसनीयता के मूल में हैं। जान लें, न्यायपालिका केवल एक संवैधानिक संस्था नहीं, बल्कि नागरिकों के अधिकारों, विधि के शासन और राज्य की जवाबदेही का सर्वोत्तम टूल है। जब कोई जनसामान्य कोर्ट की चौखट पर पहुंचता है, तो वह केवल अपने विवाद का समाधान नहीं चाहता? बल्कि उसे पूर्ण विश्वास होता है कि कानून, संविधान व निष्पक्षता के आधार पर उसकी बात सुनी जाएगी, निष्पक्ष न्याय मिलेगा। वास्तव में, न्यायालय की प्रत्येक कार्यवाही केवल एक मुकदमे तक सीमित नहीं रहती। अपितु वह समाज में न्याय, अनुशासन व संवैधानिक मूल्यों के प्रति विश्वास को भी अंगीकार करती है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान एक युवा वकील द्वारा अमर्यादित आचरण व अभद्र भाषा के प्रयोग को कहीं से भी उचित नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन इस घटना को एक विवाद या सनसनी के रूप में देखने के बजाए उसके व्यापक सामाजिक, कानूनी, मनोवैज्ञानिक व लोकतांत्रिक आयामों को समझना समीचीन होगा। कोर्ट वह स्थान है, जहां भावनाओं की नहीं, बल्कि तथ्यों, विधिक तर्कों व संवैधानिक सिद्धांतों की प्रधानता होती है। यदि कोई न्यायिक प्रक्रिया से असहमत है, तो उसके लिए पुनर्विचार, अपील व विधिक उपचार के अनेक संवैधानिक विकल्प उपलब्ध हैं, किंतु किसी व्यक्ति द्वारा कोर्ट में अपमानजनक व्यवहार लोकतांत्रिक व्यवस्था में कतई अस्वीकार्य है। हमारी न्यायपालिका की सबसे बड़ी शक्ति उसकी संस्थागत विश्वसनीयता है। जज अपने निर्णयों के माध्यम से बोलते हैं। अतएव कोर्ट का सम्मान किसी व्यक्ति विशेष का सम्मान नहीं, अपितु उस संवैधानिक व्यवस्था का सम्मान है, जो नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करती है। लिखना जरूरी कि लोकतंत्र की सफलता केवल कानून बनाने से नहीं, बल्कि उन कानूनों का सम्मान करने वाली नागरिक संस्कृति विकसित करने से भी होती है। यह कटु सत्य है कि न्यायालयों में आने वाले अनेक लोग लंबे समय से चल रहे मुकदमों, आर्थिक कठिनाइयों, सामाजिक दबाव, पारिवारिक विवादों और मानसिक तनाव से गुजरते हैं। कई बार न्याय मिलने में विलंब, व्यक्तिगत निराशा या व्यवस्था के प्रति असंतोष व्यक्ति के व्यवहार को प्रभावित कर सकता है, हालांकि मानसिक तनाव किसी भी प्रकार के अनुचित व्यवहार का औचित्य नहीं बन सकता, किंतु यह संकेत जरूर देता है कि न्यायिक प्रक्रिया को केवल कानूनी दृष्टि से नहीं, बल्कि मानवीय दृष्टिकोण से भी देखने की आवश्यकता है। सुप्रीम कोर्ट में घटी संदर्भित घटना हमारे सार्वजनिक जीवन में संवाद की बदलती संस्कृति का भी तात्कालिक उदाहरण है। पिछले एक दशक में डिजिटल माध्यमों और सामाजिक मीडिया ने विचारों के आदान-प्रदान को अभूतपूर्व गति दी है। इसके सकारात्मक परिणामों के साथ एक नकारात्मक प्रवृत्ति भी उभरकर सामने आई है। जिसमें धैर्य, शालीनता व तर्क की जगह तत्काल प्रतिक्रिया, आक्रामक भाषा तथा भावनात्मक ध्रुवीकरण ने ले ली है। जब सार्वजनिक मंचों पर असहमति व्यक्त करने का तरीका लगातार कठोर और असभ्य होता जा रहा है। जनतंत्र में आलोचना का अधिकार मूलभूत है, किंतु आलोचना व अपमान के बीच का अंतर समझना भी आवश्यक है। यदि कोर्ट में अनुशासनहीनता को सामान्य मान लिया जाए तो भविष्य में यह संस्था स्वतंत्र व निर्भीक होकर कार्य नहीं कर पाएगी। यह सत्य कि न्यायालय आलोचना से ऊपर नहीं हैं। उनके निर्णयों की विधिक समीक्षा हो सकती है, अकादमिक विश्लेषण भी अवश्यंभावी है। अंतर केवल इतना है कि आलोचना तथ्यों, विधिक तर्कों व मर्यादित भाषा में होनी चाहिए। विधिक पेशे की गरिमा केवल कानून के ज्ञान से नहीं, बल्कि नैतिकता, संयम व पेशेवर आचरण से भी निर्धारित होती है। मीडिया की भूमिका भी इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण। कोर्ट से जुड़ी किसी भी घटना की रिपोर्टिंग करते समय तथ्यात्मक शुद्धता की प्राथमिकता होनी चाहिए। यदि किसी घटना को अधूरी जानकारी, भ्रामक शीर्षक या संदर्भ से हटकर प्रस्तुत किया जाता है, तो समाज में भ्रम और अविश्वास दोनों बढ़ सकते हैं। आज डिजिटल माध्यमों पर कुछ सेकंड की वीडियो क्लिप पूरे घटनाक्रम की जगह ले लेती है, जबकि न्यायालय की कार्यवाही का वास्तविक संदर्भ कहीं अधिक व्यापक होता है। लोकतंत्र में संस्थाओं की प्रतिष्ठा केवल कानून से सुरक्षित नहीं रहती। इसके लिए नागरिकों की चेतना व जिम्मेदार व्यवहार भी अहम भूमिका निभाते हैं। संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। उसी संविधान में कानून का सम्मान, सार्वजनिक व्यवस्था व संस्थागत गरिमा का महत्व भी निहित है। आज आवश्यकता आमजन द्वारा कठोर प्रतिक्रिया देने से अधिक गंभीर आत्ममंथन की है। उसी प्रकार न्यायपालिका को भी अपनी निष्पक्षता, पारदर्शिता व दक्षता को निरंतर सुदृढ़ करना होगा। साथ ही विधिक समुदाय को पेशेवर नैतिकता को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी।
GDS Times | Hindi News Latest News & information Portal