विंध्य की पहाड़ियों की शांत ढलानों के बीच बनी बाघ गुफाएं भारतीय कला और बौद्ध स्थापत्य की अनूठी विरासत हैं, जहां पत्थरों में इतिहास के साथ सदियों पुरानी कला की सांसें भी महसूस होती हैं। मध्य प्रदेश के धार जिले से करीब 97 किलोमीटर दूर बाघिनी नदी के किनारे स्थित ये गुफाएं कभी बौद्ध भिक्षुओं के साधना और विश्राम का केंद्र थीं। शिलाओं को काटकर बनाए गए इन विहारों और चैत्य कक्षों की दीवारों पर बने भित्तिचित्र प्राचीन भारतीय चित्रकला की समृद्ध परंपरा को दर्शाते हैं। अजंता की गुफाओं से साम्य रखने वाली बाघ गुफाओं की चित्रकला में आध्यात्मिक विषयों के साथ तत्कालीन जीवन के सांसारिक रंग भी नजर आते हैं। कभी नौ गुफाओं का यह समूह था, लेकिन अब केवल पांच ही बची हैं। लंबे समय तक उपेक्षित रहने के बाद यहां बाघों के बसेरे की कथाओं से इनके नाम की कहानी जुड़ी। आज ये गुफाएं इतिहास, स्थापत्य और कला के अद्भुत संगम के रूप में आकर्षण का केंद्र हैं। बाघ गुफाएं, मध्य प्रदेश में धार जिले से 97 किलोमीटर दूर विन्ध्य पर्वत के दक्षिणी ढलान पर हैं। ये इंदौर और वडोदरा के बीच में बाघिनी नामक छोटी सी नदी के बाएं तट पर और विन्ध्य पर्वत के दक्षिण ढलान पर स्थित हैं। यह स्थल उस विशाल प्राचीन मार्ग पर स्थित है, जो उत्तर से अजंता होकर सुदूर दक्षिण तक जाता है। इन गुफाओं का संबंध बौद्ध धर्म से है। यहां अनेक बौद्ध मठ और मंदिर देखे जा सकते हैं। इन गुफाओं में चैत्य हॉल में स्तूप हैं और रहने की कोठरी भी बनी हैं, जहां बौद्ध भिक्षु रहा करते थे। कुछ इतिहासकार इन्हें चौथी और पांचवीं सदी में निर्मित मानते हैं, लेकिन अधिकतर सातवीं सदी में। अजंता और एलोरा गुफाओं की तर्ज पर ही बाघ गुफाएं बनी हुई हैं। ये गुफाएं भी मानव निर्मित हैं और प्राचीन भारतीय कलाकारों द्वारा बनाए गए भित्ति चित्रों के लिए प्रसिद्ध हैं। ये प्राकृतिक गुफाएं नहीं हैं, बल्कि शिलाओं को काटकर बनाई गई कलाकृतियों के उदाहरण हैं। इनके भित्ति चित्र अजंता गुफाओं के समकालीन हैं और कलाकृतियां आध्यात्मिकता की अपेक्षा सांसारिक प्रकृति की अधिक हैं। लगभग 10 वीं शताब्दी के आसपास हुए बौद्ध धर्म के पतन के बाद इन गुफाओं का परित्याग कर दिया गया, जिसके बाद ये गुफाएं बाघों के निवास में बदल गईं और नाम बाघ गुफाएं पड़ गया। यहां बसे गांव को बाघ गांव और यहीं से बहने वाली नदी को बाघिनी नदी के नाम से जाना जाने लगा।
रंग महल और पांडव गुफा
गुफा- 4 को रंग महल के नाम से जाना जाता है, यह उन पांच गुफाओं में सबसे महत्वपूर्ण है, जो अभी भी मौजूद हैं। बाघ गुफाओं में भित्तिचित्र काफी प्रसिद्ध हैं। चित्रकारी से पहले दीवारों और छतों को भूरे-नारंगी रंग के गाढ़े मिट्टी के प्लास्टर से ढका जाता था। प्लास्टर के ऊपर चूने का प्राइमर लगाया गया, फिर पेंट किया गया। चित्रकला में इसे टेंपेरा तकनीक कहा जाता है। इसमें जमीन को तैयार करने के लिए दीवारों और छतों पर लाल-भूरे रंग का दानेदार और मोटा मिट्टी का प्लास्टर फैलाया गया था। गुफा संख्या- 2 जिसे लोकप्रिय रूप से “पांडव गुफा” के नाम से जाना जाता है, सबसे अच्छी तरह से संरक्षित की गई है।
मूल नौ गुफाओं में अब केवल पांच ही बची हैं
इन गुफाओं की खोज साल 1818 में की गई थी। आज मूल 9 गुफाओं में से केवल 5 ही बची हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार बौद्ध भिक्षु दाताका ने इन गुफाओं का निर्माण कराया था। इन गुफाओं को चौथी शताब्दी के उत्तरार्ध और छठी शताब्दी के प्रारंभ के बीच तराशा गया था। ये सभी विहार हैं यानी भिक्षुओं के विश्राम स्थल, जिनका आकार चतुर्भुजाकार है। चैत्य, यानी प्रार्थना कक्ष, एक छोटा-सा कक्ष है, जो आमतौर पर पीछे की ओर स्थित है।
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