भारत की राजधानी दिल्ली में सुहावने मौसम के बीच जब दो मित्र देश भारत और रूस के राष्ट्राध्यक्ष मिले तो द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत करने, व्यापार बढ़ाने, रक्षा सौदों आदि को लेकर तो व्यापक वार्ता हुई ही साथ ही यूक्रेन युद्ध का मुद्दा भी प्रधानमंत्री मोदी ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के समक्ष बड़ी प्रमुखता से उठाया। इसके अलावा, दोस्त भारत के लिए रूस ने जिस तरह एक से एक घातक रक्षा उपकरण और तकनीक देने के प्रस्ताव सामने रख दिये हैं उससे पूरी दुनिया में खलबली मच गयी है। साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन जब भी साथ होते हैं, तो उनकी बातचीत ही नहीं, उनके हावभाव भी दुनिया को कई बड़े संदेश देते हैं, इस बार भी ऐसा ही हुआ। BRICS शिखर सम्मेलन से पहले मोदी और पुतिन की करीब 45 मिनट चली द्विपक्षीय बातचीत और उसके बाद दोनों नेताओं का एक ही कार में भारत मंडपम पहुंचना उस भरोसे का संकेत है जिसने दशकों पुराने भारत-रूस संबंधों को बदलती विश्व व्यवस्था में भी मजबूती से टिकाए रखा है। हम आपको बता दें कि इस वर्ष दोनों नेताओं की यह दूसरी बैठक है। बैठक में भारत-रूस द्विपक्षीय सहयोग की प्रगति की समीक्षा की गई, जिसमें राजनीति, अर्थव्यवस्था, रक्षा, ऊर्जा, अंतरिक्ष, कौशल गतिशीलता और जन-जन संपर्क जैसे प्रमुख क्षेत्र शामिल रहे। दोनों नेताओं ने 9 से 11 सितंबर तक पहली बार भारत में आयोजित रूस की अंतरराष्ट्रीय औद्योगिक प्रदर्शनी ‘INNOPROM India’ का भी दौरा किया और प्रतिभागियों से बातचीत की। इसके अलावा ब्रिक्स में भारत की 2026 की अध्यक्षता, पश्चिम एशिया और काला सागर क्षेत्र के संघर्षों सहित विभिन्न क्षेत्रीय एवं वैश्विक मुद्दों पर विचारों का आदान-प्रदान हुआ। प्रधानमंत्री मोदी ने संघर्षों के समाधान के लिए संवाद और कूटनीति को आगे बढ़ाने की आवश्यकता दोहराते हुए शांति प्रयासों में भारत की भूमिका की पेशकश की। दोनों नेताओं ने भारत-रूस विशेष एवं विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने पर सहमति जताई। इस दौरान राष्ट्रपति पुतिन ने प्रधानमंत्री मोदी को 24वें भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन के लिए रूस आने का निमंत्रण दिया, जिसे प्रधानमंत्री ने स्वीकार कर लिया। सम्मेलन की तारीख आपसी सहमति से राजनयिक माध्यमों के जरिए तय की जाएगी। साथ ही दिलचस्प और बेहद महत्वपूर्ण बात यह भी है कि रक्षा और रणनीतिक सहयोग के इतने बड़े एजेंडे के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज की बातचीत में भी यूक्रेन युद्ध का मुद्दा उठाया और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के सामने युद्ध खत्म करने तथा शांति की दिशा में आगे बढ़ने की भारत की स्पष्ट सोच रखी। हम आपको यह भी याद दिला दें कि करीब 11 दिन पहले यानि 31 अगस्त को भी किर्गिस्तान के बिश्केक में SCO शिखर सम्मेलन के दौरान मोदी ने पुतिन से सीधे कहा था कि अब दुनिया को “अनंत युद्ध” से निकलकर “युद्ध की समाप्ति” की ओर बढ़ना चाहिए और हर दिन जारी रहने वाला युद्ध मानवता को पीछे धकेलता है। यहां मोदी की कूटनीतिक ताकत का सबसे बड़ा प्रमाण दिखाई देता है। जिस समय पश्चिमी देश रूस पर दबाव, प्रतिबंध और अलगाव की नीति अपना रहे हैं, उसी समय भारत रूस के साथ अपनी रक्षा, ऊर्जा और आर्थिक साझेदारी को मजबूती से जारी रखते हुए उसके सर्वोच्च नेतृत्व के सामने युद्ध समाप्त करने की बात कहने की स्थिति में है। यह ताकत किसी दबाव की राजनीति से नहीं, बल्कि भरोसे की उस असाधारण पूंजी से पैदा हुई है जिसमें भारत रूस का मित्र और रणनीतिक साझेदार है, लेकिन रूस की हर नीति का आंख मूंदकर समर्थक नहीं है। मोदी पुतिन से असहमति व्यक्त कर सकते हैं, युद्ध खत्म करने की अपील कर सकते हैं और साथ ही भारत-रूस रक्षा साझेदारी को भी आगे बढ़ा सकते हैं, यही भारत की स्वतंत्र और बहुध्रुवीय विदेश नीति की असली ताकत है। उधर, मोदी और पुतिन की आज की मुलाकात से जुड़ी सबसे बड़ी खबर यह है कि मॉस्को भारत के सामने केवल हथियार बेचने का प्रस्ताव नहीं रख रहा, बल्कि रक्षा तकनीक, संयुक्त उत्पादन और संभावित संयुक्त विकास का ऐसा पैकेज रख रहा है, जिसका सीधा असर एशिया से लेकर वैश्विक सामरिक समीकरणों तक दिखाई दे सकता है। रूस ने भारत में Su-57 पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों के संयुक्त उत्पादन, इंजन तकनीक साझा करने, अतिरिक्त S-400 प्रणालियों, Pantsir-S1M, आधुनिक रडार और रणनीतिक पनडुब्बियों से जुड़े प्रस्ताव सामने रखे हैं। हम आपको बता दें कि सबसे बड़ा दांव Su-57 पर है। रूस भारत को दो स्क्वाड्रन विमान सीधे देने के साथ भारत में तीन से पांच अतिरिक्त स्क्वाड्रनों के संयुक्त उत्पादन का प्रस्ताव दे रहा है। इससे भी आगे बढ़कर मॉस्को Su-57 के इंजन से जुड़ी तकनीक भारत के साथ साझा करने को तैयार है, ताकि उसके महत्वपूर्ण हिस्सों का निर्माण भारत में हो सके। हालांकि यह तकनीकी सहयोग Su-57 की खरीद से जुड़ा हुआ है। यह प्रस्ताव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत अपनी स्वदेशी AMCA परियोजना के आने तक पांचवीं पीढ़ी की लड़ाकू क्षमता में संभावित अंतर को भरने के विकल्प तलाश रहा है। लेकिन भारत आंख बंद करके कोई फैसला करने के मूड में नहीं है। भारतीय वायुसेना की प्राथमिकता फिलहाल 114 Rafale, AMCA और यूरोपीय FCAS में भागीदारी पर बनी हुई है। Su-57 को लेकर भारतीय चिंताएं नई नहीं हैं। 2018 में भारत FGFA कार्यक्रम से बाहर निकल चुका है। उस समय बढ़ती लागत, इंजन की क्षमता, सीमित stealth, तकनीक हस्तांतरण और रूस की परियोजना के प्रति प्रतिबद्धता जैसे सवाल उठे थे। भारत ने प्रारंभिक डिजाइन चरण में 1,483 करोड़ रुपये लगाए थे और आगे 127 विमानों के लिए लगभग 35 अरब डॉलर की लागत का अनुमान सामने आया था। इसलिए इस बार रूस की पेशकश को भारत की जरूरतों और तकनीकी शर्तों की कसौटी पर ही परखा जाएगा।
GDS Times | Hindi News Latest News & information Portal