अरुणाचल प्रदेश के 27 स्थानों के नाम बदलकर चीन को यह लगा था कि इतिहास बदल जाएगा। लेकिन भारत ने उसको मुंह की दिखा दी। अब भारत के पूर्व विदेश सचिव कमल सिबल ने बीजिंग के इस काल्पनिक संसार की धज्जियां उड़ा दी हैं। सिबल साहब का सबसे बड़ा खुलासा यह है कि चीन की यह नक्शा नीति सिर्फ भारत के खिलाफ ही नहीं है बल्कि उसने नन्हे से भूटान को भी अपने जबड़े में फंसाने की तैयारी कर ली है। दरअसल कमल सिब्बल ने जिन शब्द का इस्तेमाल किया कार्टोग्राफिक टेरिटोरियल एक्सपेंस निज्म यह चीन की सबसे घातक चाल है। चीन सीधे युद्ध करने के बजाय पहले माइंड गेम खेलता है। वो किसी भी क्षेत्र के लिए अपने पुराने अप्रचलित और मनगढ़न नाम का इस्तेमाल करता है। फिर धीरे-धीरे उसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आधिकारिक बनाने की कोशिश करता है। और यहीं पर सिबल ने बताया कि भारत सरकार ने अब रक्षात्मक होने के बजाय प्रोएक्टिव रुख अपना लिया है। सर्वे ऑफ इंडिया द्वारा अरुणाचल प्रदेश के 27 स्थानों के नामों को मानकीकृत करना यह सुनिश्चित करना है कि अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का पक्ष ही आधिकारिक माना जाएगा। यह चीन की नेमिंग पॉलिटिक्स की जड़ों पर प्रहार है जिससे अब कभी चीन उबर नहीं पाएगा। अब इस खबर का सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण हिस्सा भूटान है। उन्होंने साफ कर दिया कि भूटान को भी चीन ने नहीं छोड़ा है। खगोलशास्त्र
अब क्या भूटान है ड्रैगन की अगली भूख?
चीन भूटान के साथ सीमा विवाद को सुलझाने के नाम पर उसकी रणनीतिक चोटियों और चारागाहों पर दावा ठोक रहा है। कमल सिबल के अनुसार चीन भूटान को डराकर भारत के साथ उसके पुराने और अटूट संबंधों को तोड़ना चाहता है। चीन का लक्ष्य चीन का टारगेट भूटान की जमीन के जरिए भारत के चिकन नेक यानी कि सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर दबाव बनाना है। अब कमल सिबल ने चेतावनी दी है कि चीन की मत्वाकांक्षाएं सिर्फ लद्दाख या अरुणाचल तक सीमित नहीं है। वो पूरे हिमालय क्षेत्र को अपने प्रभाव में लेना चाहता है। अब यही वजह है कि पूर्व विदेश सचिव ने इतिहास की उस दुगती रख पर हाथ रख दिया जिसे चीन हमेशा छिपाना चाहता था। 1950 से पहले भारत और चीन के बीच कभी कोई सीमा समझौता नहीं था। भारत के पड़ोस में एक स्वतंत्र धार्मिक और शांतिप्रिय देश था जिसका नाम है तिब्बत। भारत ने तिब्बत पर चीन के नियंत्रण को स्वीकार किया ताकि पड़ोस में शांति बनी रहे। पंचशील समझौता उसे कहते थे। लेकिन सिविल ने आरोप लगाया कि चीन ने इस उदारता का फायदा उठाया। अब वह तिब्बत को एक लॉन्च पैड की तरह इस्तेमाल करके भारत की अतिरिक्त जमीन मांग रहा है।
चीन का खोखला तर्क
कमल सिबल का सवाल सीधा है कि तिब्बत के बाद आखिर चीन कहां रुकेगा और जब चीनी एक्सपर्टों ने भारत के इस कदम को भ्रम कहा तो यह उनकी बौखलाहट का प्रमाण है। यानी चीन की बौखलाहट का प्रमाण है। चीन यह कहता है कि इससे रिश्तों में सुधार की कोशिश को नुकसान होगा। सीबल का जवाब यह है कि रिश्तों में दरार भारत के अपने स्थानों के नाम तय करने से नहीं बल्कि चीन के घुसपैठ और फर्जी दाव से आई है। सिबल का विश्लेषण यह संदेश देता है कि भारत अब चीन की ब्लैकमेलिंग वाली कूटनीति में नहीं आने वाला है। अगर चीन नाम बदलेगा तो भारत अपनी पहचान को और भी मजबूती से स्थापित करेगा। चीन की सबसे बड़ी परेशानी यह है कि वह भूटान को दबा नहीं पाता क्योंकि भूटान की सुरक्षा की कमान अप्रत्यक्ष रूप से देखा जाए तो भारत के हाथों में है। डोकलाम तो आपको याद होगा भारत दशकों से भूटान की सेना को प्रशिक्षित कर रहा है। हां जिले में भारतीय सेना की स्थाई मौजूदगी चीन की आंखों में खटकती है। जब चीन ने भूटान के डोकलाम क्षेत्र में सड़क बनाने की कोशिश की तो भारतीय सेना ने अपनी सीमा लांगकर भूटान की जमीन के लिए चीन का मुकाबला किया। यह दुनिया के इतिहास में विरला उदाहरण था जहां एक देश दूसरे देश की जमीन बचाने के लिए महाशक्ति से टकरा गया।
चिकन नेक की सुरक्षा और नई कनेक्टिविटी
चीन को डर यह है कि वो भूटान पर सैन्य दबाव नहीं बना सकता क्योंकि भारत तुरंत बीच में आ जाएगा और यही वजह है कि चीन भूटान को अपने प्रभाव में लेकर भारत के चिकन नेक यानी सिलीगुड़ी कॉरिडोर तक पहुंचना चाहता है। लेकिन भारत ने इसे नाकाम करने के लिए भूटान में विकास की गंगा बहा दी है। भारत और भूटान के बीच पहली रेलवे लिंक पर काम शुरू हो चुका है। यह ना केवल व्यापार बढ़ाएगा बल्कि युद्ध की स्थिति में भारतीय सेना की पहुंच को और भी तेज कर देगा। सीमा सड़क संगठन यानी बीआरओ भूटान में बेहतरीन सड़कों का निर्माण कर रहा है। चीन परेशान है क्योंकि यह सड़कें भूटान के सुदूर इलाकों तक भारत की पहुंच आसान बना रहा है जिससे चीन की सलामी स्लाइसिंग नीति पूरी तरह से फेल हो चुकी है।
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