स्वाधीनता आंदोलन की देशव्यापी लड़ाई में क्रांति की तीन प्रमुख धाराएं उठी थीं। इनमें से दूसरी धारा का नेतृत्व जनपद शाहजहांपुर ने किया। यह लहर गांधी जी द्वारा असहयोग आंदोलन वापस लेने के बाद उठी और भगत सिंह की शहादत तक उरूज पर रही। बाद में चटगांव के सूर्यसेन की शहादत के साथ यह क्रांतिकारी दौर अपने एक महत्वपूर्ण पड़ाव पर पहुंचा। शाहजहांपुर के तीन युवा क्रांतिकारी- पंडित रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्लाह खान और ठाकुर रोशन सिंह इस धारा के प्रमुख नायक थे। पंडित रामप्रसाद बिस्मिल का जन्म 11 जून 1897 को मैनपुरी स्थित उनके ननिहाल में हुआ था। आर्य समाज और क्रांतिकारी विचारों से प्रभावित बिस्मिल ने गेंदालाल दीक्षित की प्रेरणा से मातृदेवी संस्था बनाई। वर्ष 1918 में मैनपुरी षड्यंत्र में उन पर प्रतिबंधित पुस्तकों के वितरण का आरोप लगा। गांधी जी के असहयोग आंदोलन के दौरान उन्होंने पूरे मनोयोग से आंदोलन में भाग लिया, लेकिन आंदोलन वापस लिए जाने से वे निराश हुए और सशस्त्र क्रांति की राह पर आगे बढ़े।
अशफाक उल्लाह खान का जन्म 22 अक्टूबर 1900 को हुआ था। बिस्मिल के सहपाठी रहे उनके बड़े भाई के माध्यम से अशफाक बिस्मिल के संपर्क में आए। शायरी के शौक ने दोनों को करीब लाया और शीघ्र ही अशफाक राष्ट्रवादी आंदोलन के सक्रिय साथी बन गए। ठाकुर रोशन सिंह का जन्म 22 जनवरी 1892 को हुआ था। वे असहयोग आंदोलन को ग्रामीण क्षेत्रों तक ले जाने में सक्रिय रहे और इसी दौरान बरेली सेंट्रल जेल में छह माह की सजा भी काटी। असहयोग आंदोलन की वापसी के बाद लाला लाजपत राय की प्रेरणा से बिस्मिल और शचींद्रनाथ सान्याल ने अक्टूबर 1924 में कानपुर में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की नींव रखी। इसका उद्देश्य सशस्त्र क्रांति के माध्यम से ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकना था। शीघ्र ही संगठन का नेटवर्क बंगाल, महाराष्ट्र, पंजाब और उत्तर भारत तक फैल गया। काकोरी ट्रेन एक्शन: संगठन को चलाने के लिए धन की आवश्यकता थी। तय हुआ कि सरकारी खजाना लूटा जाएगा। 9 अगस्त 1925 को काकोरी ट्रेन एक्शन को अंजाम दिया गया। सहारनपुर-लखनऊ पैसेंजर ट्रेन को काकोरी के पास चेन खींचकर रोका गया और सरकारी खजाने का संदूक उतारकर तोड़ा गया। इस कार्रवाई का नेतृत्व पंडित रामप्रसाद बिस्मिल ने किया। अशफाक उल्लाह खान, चंद्रशेखर आजाद सहित अन्य क्रांतिकारी भी इसमें शामिल थे। कार्रवाई के दौरान चली एक गोली से अहमद नामक यात्री की मृत्यु हो गई। काकोरी की घटना ने ब्रिटिश सरकार को हिला दिया। पुलिस ने जांच तेज की और एक चादर पर बने शाहजहांपुर के धोबी के निशान के सहारे बनारसी लाल तक पहुंची। गिरफ्तारियों का सिलसिला शुरू हुआ। बिस्मिल 26 सितंबर 1925 को गिरफ्तार किए गए, जबकि अशफाक दिल्ली से पकड़े गए। ठाकुर रोशन सिंह को बरमौली डकैती के मामले में अभियुक्त बनाया गया। मुकदमा और शहादत- काकोरी मुकदमे में बिस्मिल, अशफाक और राजेंद्र लाहिड़ी को फांसी की सजा सुनाई गई। ठाकुर रोशन सिंह को भी बरमौली मामले में मृत्युदंड मिला। सजा कम कराने के लिए देश के अनेक नेताओं ने प्रयास किए, लेकिन ब्रिटिश सरकार टस से मस नहीं हुई। 19 दिसंबर 1927 भारतीय इतिहास का वह दिन है, जब तीनों महान क्रांतिकारियों ने अलग-अलग जेलों में फांसी का वरण किया। गोरखपुर जेल में पंडित रामप्रसाद बिस्मिल को प्रातः 6:30 बजे फांसी दी गई। उनकी अंतिम यात्रा में लगभग डेढ़ लाख लोग शामिल हुए। उनका अंतिम संस्कार राप्ती नदी के किनारे राजघाट पर किया गया। इसी दिन फैजाबाद जेल में अशफाक उल्लाह खान को फांसी दी गई। उनका शव शाहजहांपुर लाया गया और पारिवारिक घर के निकट जलाल नगर बजरिया क्षेत्र में सुपुर्द-ए-खाक किया गया। इलाहाबाद की नैनी जेल में ठाकुर रोशन सिंह ने भी फांसी का वरण किया। फांसी से पहले उन्होंने गीता का पाठ किया, ‘वंदे मातरम्’ का जयघोष किया और पूरे आत्मविश्वास के साथ फंदे को चूमकर गले में डाल लिया।
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